खाती समाज के बारे में विस्तृत जानकारी

नीचे दिए गए 10 पेज में खाती समाज के बारे में विस्तृत जानकारी विभिन्न ग्रंथो, कहानियों, छंद एवं कविताओं के माध्यम से संकलित की गई है। इन्हें बिना अनुमति किसी अन्य वेबसाइट पर कॉपी करने पर क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है। 

  • समाज की उत्पत्ति
  • गौत्र एवं आस्पद
  • मान्यता एवं संस्कार
  • विवाह संबंधी प्रथा
  • मकान एवं परिधान
  • पेज संख्या 6
  • पेज संख्या 7
  • पेज संख्या 8
  • पेज संख्या 9
  • पेज संख्या 10

खाती समाज (Khati Samaj) के संबंध में अभी तक जो भी प्रमाण सामने आए हैं, वे या तो बिखरे पड़े हैं अथवा किसी ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया है। ऐसे में यह जिज्ञासा बनी रहती है कि आखिर इस समाज की उत्पत्ति और विकास का इतिहास क्या होगा! इन तमाम प्रश्नों से न तो हमारे बुजुर्ग वाकिफ रहे हैं और न ही पढ़े-लिखे युवा। यह सबके लिए दिलचस्प होगा कि हम इस वेबसाइट (KhatiSamaz.com) माध्यम से समाजजन ही नहीं, हर सामाजिक अनुसंधानकर्ता और समाज पर सवाल उठाने वालों को  ऐसी ठोस और तथ्यपरक जानकारी संग्रहित करके दी जा रही है, जो न सिर्फ उनकी जानकारी के लिए मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और पुख्ता प्रमाण के साथ होने के कारण ठोस दस्तावेज भी साबित होगी। एक खास अंदाज में जीने वाली एक ऐसी जाति के अतीत और वर्तमान का यहां सप्रमाण वर्णन किया जा रहा है, जो न सिर्फ इस देश के लिए महत्वपूर्ण कार्य है, बल्कि विश्व के पटल पर भी हमारे समाज जाति का जो अस्तित्व रहा है, उसे उसकी संपूर्णता के साथ संजोया जा रहा है। इस जाति की उत्पत्ति और कार्य से लेकर जीवनयापन के विभिन्न तौर-तरीकों को स्थान देकर इसे ऐतिहासिकता के साथ रोचक दस्तावेज भी बनाया गया है। इसलिए भी इस जाति का इतिहास लिखने की जरूरत आन पड़ी है कि यह जाति ऐसी है जो कई-कई खूबियों से लदी हुई है। ये खूबियां रोचक और दिलचस्प होने के साथ ही ऐतिहासिक तथ्य भी हैं। जीवन के एक खास रंग और ढंग को जीने वाले खाती समाज (Khati Samaj) के लोगों को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उनका इतिहास एक समृद्ध परंपरा का वाहक रहा है। समय की धारा में उनके विकास में कई पड़ाव आए हैं। उन पड़ावों की चर्चा करना भी इस ग्रंथ का लक्ष्य रहा है। किसी भी समाज के विकास में प्रारंभ से अंत तक आने वाली स्थिति और परिस्थितयों का योगदान होता है, खाती समाज भी इससे अछूता नहीं रहा है। साथ ही कुछ अहम बातें भी खाती समाज से जुड़ी रही है। इन तमाम महत्वपूर्ण बातों को इस वेबसाइट (khatisamaz.com) में संग्रहित किया गया है। इसमें समाजजनों को उनके गौरवपूर्ण अतीत को जानकर प्रसन्नता होगी, वहीं इस बात की भी जानकारी मिलेगी कि वे सब कहां से और किन परिस्थितियों में वहां आए, जहां आज उनका ठिकाना है। उनके समाज में किन बातों का बड़ा मोल रहा है और समय के साथ कौन से बदलाव आए हैं। खूबियों के साथ ही पिछड़ेपन की बातें भी पता चलेंगी, जिससे इतिहास और विकास के उस अध्याय के पेज पर भी क्लिक कर सकेंगे, जो अभी तक समय के गर्भ में रहे हैं। अब तक हमारे समाज के लोग भाट-चारणों की सीमित जानकारी के माध्यम से ही अपने पूर्वजों के बारे में जानते थे। इस कमी को पूरा करने के लिए यह वेबसाइट (khatisamaz.com) मील का पत्थर साबित हो सकता है। इस जाति के विकास की गाथा के संतुलित और संग्रहणीय दस्तावेज के रूप में यह ग्रंथ आपके लिए प्रस्तुत किया गया है। खाती समाज भारतीय वर्ण व्यवस्था की एक ऐसी कड़ी है जिसका प्राचीन इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। बावजूद इसके अपनी एकांतप्रियता, ग्रामीण परिवेश, अशिक्षा एवं इन सबके कारण उपजी कुरीतियों-कुप्रथाओं और संकीर्णताओं के परिणामस्वरूप खाती समाज सैकड़ों सालों से पिछड़ता चला आ रहा है। इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने भी इस समाज का अध्ययन करने की आवश्यकता महसूस नहीं की। जनगणना के आंकड़ों से साफ है कि समाज अभी भी कई मामलों में आज की दुनिया से बहुत पीछे है। इस पिछड़ेपन को दूर करने का एक ही उपाय है और वह है शिक्षा।

यदि प्राचीन इतिहास एवं भाट तथा चारणों की पोथियों को देखा जाए तो भी साफतौर पर पता नहीं चलता कि खाती समाज (Khati Samaj) के पूर्वज मूलतः आर्य की किस शाखा से संबंधित हैं। यदि आर्य भारत में बाहर से आए तो हमारे पूर्व समाजजन भारत के किस भूभाग के निवासी बने। इन चर्चाओं को लेकर कुछ लिखित एवं प्रचलित मान्यताएं इस प्रकार हैं -

खाती समाज (Khati Samaj) आज से लगभग साढ़े चार हजार साल पहले महाराजा कार्तवीर्य अर्जुन अर्थात सहस्रबाहू के वंशजों से उत्पन्न हुआ। महाराज सहस्रबाहू की मृत्यु के बाद उनके 105 पुत्रों से जो वंश चला वह समग्र रूप में खाती समाज कहलाया। क्षत्रीय अर्थात 'क्षात्र' परंपराओं का परित्याग करने के कारण ही इन्हें खत्री अथवा 'खाती' कहा गया। प्राकृत भाषा शब्दकोषों में खाती शब्द का अर्थ है खनन अर्थात खुदाई कार्य करने वाला। साफतौर पर यह एक व्यावसायिक अर्थ का द्योतक है। ऐसा प्रतीत होता है कि बंजर धरती को खोदकर खेती योग्य भूमि बनाने वाले लोगों को कालान्तर में खाती की संज्ञा दी गई। मूलपुरुष सहस्रबाहु के नाम को यदि उपाधि मान लिया जाए तो उसके अन्य अर्थों के साथ-साथ यह भी एक अर्थ होता है कि जिसकी धरती पर हजारों हलों की जुताई की जाती हो। वह युग भारत में खेती संस्कृति के विकास का युग था। प्रारंभ में जिन वंशजों ने खेती के कार्य को अपना लिया, वे खाती (Khati Samaj) कहलाए। भगवान परशुराम भार्गव भगवान रामचंद्र के समकालीन थे। इन्हीं परशुराम भार्गव ने नर्मदा के समीप महिस्मति नगरी अर्थात महेश्वर के चकवर्ती सम्राट सहस्रबाहु को पराजित किया। आज भी महेश्वर में हमारी जाति (Khati Samaj) के मूल पुरुष सहस्रबाहु की समाधि राजराजेश्वर मंदिर के रूप में विद्यमान है। परशुराम भार्गव उस युग में फैली अराजकता, हिंसा और धरती तथा साम्राज्य के लिए लड़े जाने वाले युद्धों के विरोधी थे। वे धरती को महिदेवों में बांट देना चाहते थे। सहस्रबाहु इस नजरिये से उनका प्रथम लक्ष्य बने। उन्हें पराजित करने के बाद मिथिला नरेश जनक की प्रार्थना पर जिन पुत्रों को प्राणदान मिला, उन्हें यह निर्देश भी मिले कि आने वाले समय में वे तथा उनके वंशज खेती कर्म करते रहेंगे तथा राज्य लिप्सा से दूर रहेंगे। इस लिहाज व्यवस्था एक पराजित राजवंश का स्थायी तथा शांतिपूर्ण पुनर्वास थी। यद्यपि सहस्रबाहु के अनेक पुत्रों ने अलग अलग व्यवसाय अपनाएं। कुछ खाती समाज के ये वंशज छोटे -छोटे भू भागों के शासक भी रहे। और समय -समय पर विशाल साम्राज्यों के संस्थापक बने। 105 पुत्रों ने अपनी माता और अन्य परिजनों के साथ खेती कर खाती समाज (Khati Samaj) की आधारशीला रखी। 

मनुष्य के संबंध में अधिक जानने के लिए तथा उसके वंश और अतीत को पहचानने के लिए गौत्र और उसके साथ प्रवर जोड़ा जाता था। जब गौत्र से बात नहीं बनती थी, तो उसकी पहचान प्रवर के माध्यम से होती थी। विशेषकर ब्याह-शादी के समय इन माध्यमों का महत्व बढ़ जाया करता था। 

आस्पद और पदवी बनते रहे हैं समाज की पहचान खाती समाज ( Khati Samaj ) को आज गोत्र की अपेक्षा आस्पदों, पदों एवं उपाधियों के माध्यम से जाना जाता है। ये लोग जिन गांवों को अपना मूल निवास 'आस्पद' मानते हैं, उन्हीं के नामों से अपनी पहचान जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए खाचरौद से खाचरोदिया, तिलावद से तिलावद्या, करंज से करंजिया, बीजलपुर से बीजलपुरिया आदि। इसी प्रकार चौधरी, मुकाती मंडलोई तथा पटेल उपनाम उनके पूर्वजों को प्राप्त पदो के परिचायक हैं। इस जाति की कोई डायरेक्टरी या वंश परिचय भी प्रकाशित नहीं है। इसलिए जानकारी के लिए अब तक भाट व चारणों की पोथियों पर यह समाज आश्रित रहा है। अध्ययन एवं खोज के दौरान पुरानी पोथियों में इस समाज की उत्पत्ति का एक सिद्धांत यह भी बतलाया गया है कि मांडू सुलतानों के समय गुजरात से जो बुनकर जाति के व्यवसायी मालवा आए वही बाद में खाती कहलाए। राजस्थान में सुतार जाति भी खाती कही जाती है। इससे यह तथ्य साफ होता है कि प्रारंभ में खेती तथा उससे जुड़े व्यवसाय जैसे हल व बैलगाड़ी बनाने वाले सुतार आदि का सामूहिक समाज खाती समाज ( Khati Samaj ) कहलाता था। जाति के रूप में बहुत बाद में इस समाज को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। कालांतर में अन्य गोत्रों के लोग भी इस समाज के अंग बनते गए। इतिहासकारों की एक और संभावना है जो इस समाज की उत्पत्ति का संकेत देती है। उनकी मान्यता है कि आज से लगभग दो हजार साल पहले सेंट्रल एशिया से शासक छत्रपों के वंशज भारत आए और कश्मीर, मथुरा, उज्जैन तथा भडोंच के आसपास का भूभाग जीतकर अपना साम्राज्य स्थापित किया। मालवा में खखरात 'क्षहरात' वंश के शासकों का शासन था। खखरात लोग शिव भक्त थे और कालांतर में यहीं के निवासी होकर रह गए। कालांतर में यह खखराती खाती कहलाए। यह भी मान्यता है कि हितेशिया की हेट्टी जाति के जो लोग भारत आकर खेती व्यवसाय आदि में संलग्न हो गए, वे खाती कहलाए। परंपरानुसार समाज के वृद्धजन भी यही कहते हैं कि खाती लोग कश्मीरी है अथवा मालवा के मूल निवासी नहीं हैं। वैसे खाती जाति अपने रूप-रंग, नाक-नक्श तथा पहनावे के कारण अपना अलग ही स्थान रखती है। खानपान की कुछ परंपराएं भी इस जाति ( Khati Samaj ) में महत्वपूर्ण है। महाभारत ग्रंथ के कर्ण-शल्य संवाद में मद्रक यवनों के खानपान की चर्चा में कहा गया है कि मद्रक लोग प्याज को कूच कर खाते हैं। यह प्रथा खाती जाति ( Khati Samaj ) में आज भी विद्यमान है। अतः इन संभावनाओं की भी खोज की जाना चाहिए कि वास्तव में खाती जाति ( Khati Samaj ) का इतिहास कहां से प्रारंभ होता है। खाती लोग स्वयं को चंद्रवंशीय मानते हैं। पौराणिक वंशावलियों में सहस्रबाहु के अलावा युधिष्ठिर आदि भी चंद्रवंशी लिखा गया है। चंद्रवंश की अनेक उपशाखाएं हैं। उनमें से चंद्रवंशी खाती भी एक है।

हजारों सालों के प्राचीन इस समाज को अपना गौरव प्राप्त करना होगा। अपनी स्वतंत्र पहचान खोजना होगी अपने रीति-रिवाज, संस्कार, वेशभूषा, खानपान, रहन-सहन, देवी-देवताओं, सती-भेरू व पाटली की स्वतंत्र पहचान बनाना होगी। इसे आज का शिक्षित समाज ही कर सकता है। सम्मिश्रण के इस युग में हम अपने पूर्वजों की धरोहर को यदि संभाल नहीं पाए तो आने वाली पीढ़ियां हमारी अज्ञानता का कलंक ओढ़ने को मजबूर होगी। अतः समय रहते जो लोग ऐसे कार्यों को करना चाहते हैं, उन्हें उसे निःस्वार्थ भाव से सामाजिक हित में करने के लिए आगे आना होगा। गांवों में बिखरे समाज की जानकारी संकलित करना होगी। इस कड़ी में जो भी लोग कार्य कर रहे हैं, वह स्वागतयोग्य है। आज पूरे देश में अलग-अलग समाज के लोग संगठित होकर अपनी पहचान बना रहे हैं। विभिन्न समाजों के पारमार्थिक ट्रस्ट हैं, अस्पताल हैं; किंतु खाती समाज ( Khati Samaj ) आर्थिक रूप से संपन्न होकर भी पिछड़ा हुआ है। समाज का कोई मैरेज ब्यूरो नहीं है, सहकारी संस्थाएं, हास्पिटल एवं स्कूल, कालेज नहीं हैं। पूरा समाज अंतर्मुखी हो चुका है। कार्य है, लेकिन कार्यकर्ता नहीं हैं। यदि समाज के बुजुर्गों के मार्गदर्शन में युवकों द्वारा महत्वपूर्ण कार्यों को अपने हाथों में लिया जाए, तो सामाजिक स्थिति में सुधार आ सकता है।

समाज में कई सुधार देखने को मिले है अपितु कुछ क्षेत्रों में विशेषकर ग्रामीण जनता में अनेक मान्यता तथा अन्धविश्वास प्रचलित है। कुछ प्रमुख अन्धविश्वास के बारे में संक्षेप जानकारी उपलब्ध है। 

  1. रात्रि में कुत्ते का रोना किसी की मृत्यु का सूचक माना जाता है। 
  2. उल्लू के संबंध में एक विचित्र अंधविश्वास यह है कि जब वह बोलता है तो किसी बच्चे को रोने नहीं देना चाहिए, अन्यथा वह बचेगा नहीं।
  3. रविवार तथा बुधवार के दिन यात्रा करना अशुभ माना जाता है। 'इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि
  4. ऐसी कहावत है - 'करिया, मामन, गौर, चमार, इनके साथ न उतरिये पार ....' काले ब्राम्हण, गोरवी चमार के साथ एक ही नाव में बैठकर नदी पार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह अपशगुन माना जाता था। 
  5. एक ही नाव में बैठकर मामा-भानजे को नदी पार नहीं करना चाहिए। इसे भी अपशगुन माना जाता है।
  6. दीप जलाने की प्रथा - किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर घर में जिस जगह उसकी मृत्यु हुई है, उस स्थान को गोबर से लीपकर सारी रात उस जगह पर एक मिट्टी का दीपक जलाकर रखा जाता है।
  7. किसी बिलाव को मैथूनरत देखना भी अपशकुन माना जाता है, जिससे बचने के लिए कहा जाता है।
  8. जब नातरा या विवाह किया जाता है तो दूल्हा को वधु के साथ बाहर जाते हुए देखना अशुभ माना जाता है। साथ ही अंधविश्वास यह भी है कि किसी ने उन्हें गांव छोड़ते हुए देख लिया तो दूल्हा मर जाएगा।

खाती समाज में कई प्रथाएं महत्वपूर्ण स्थान रखती है जिन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी निभाया जाता रहा है। 

जन्म संबंधी प्रथा- किसी बच्चे के जन्म के समय यदि वह लड़का है तो सामान्यतः भोजन के उपयोग में लाई जाने वाली चाली बजाई जाती है और लड़की है तो सूपड़े को ढोलक के समान हलके से पीटा जाता है।

मुंडन संस्कार- मुंडन संस्कार 45 दिन से पांच वर्ष तक की आयु के बीच किसी भी समय किया जा सकता है। इस संस्कार में बच्चे के सिर के बालों को पूरी तरह मुंडन कर दिया जाता है। एक सूई से कर्णछेदन भी किए जाने की परंपरा है। इस अवसर पर ग्रामीण महिलाएं एकत्र होकर ढोलक की थाप पर गीत गाती हैं। कई जगह घोड़े पर बिठाकर गांव में घुमाया जाता है। 

जनेऊ संस्कार- यह ब्राम्हणों तथा उच्च वर्ग द्वारा धारण किया जाता है। खाती समाज में भी यह संस्कार उपनयन या ज्ञानारंभ कहलाता है। इसके करने से लड़का द्विज हो जाता है।

कर्णछेदन- यह कर्म हिंदुओं में सामान्य है। खाती समाज में इसका  प्रचलन पूर्व में रहा है।  इस कार्य को सुनार, स्वर्णकार द्वारा किया जाता है। जब बच्चा चार या पांच वर्ष का होता है, तब यह कार्य किया जाता है।

अंतिम संस्कार- हिंदुओं में मृतक का दाह संस्कार किया जाता है और 7 वर्ष से काम उम्र के बच्चों को दफनाते हैं। मृतक को खाट से जमीन पर उतारा जाता है और गंगा जल मुंह में डाला जाता है। पुरुषों के मामले में नए सफेद कपड़े और महिला को लाल कपड़े से ढंककर उसे दिन के समय में (रात्रि में नहीं) श्मशानघाट ले जाया जाता है। मृतक को चिता पर रखा जाता है। पिता के मामले में ज्येष्ठ पुत्र द्वारा तथा महिला के मामले में उसके पति द्वारा अग्नि दी जाती है। तीसरे दिन राख व अस्थियां (खांदिया) एकत्र कर पवित्र नदी में विसर्जित की जाती है। 11 दिनों तक शोक मनाया जाता है और रविवार व बुधवार को अशुभ दिन माने जाते हैं। इन दिनों को छोड़कर उसके संबंधी लोग शोक प्रकट करने के लिए एकत्रित होते हैं। 11वें दिन घट का आयोजन किया जाता है। शोक मनाने वाले पुरुष सदस्य सिर के बाल व दाढ़ी-मूंछ मुंडवाते हैं। पिंड दान किया जाता है तथा उसके बाद भोज करवाया जाता है। इसे मृत्यु भोज कहते हैं। खातियों में इसे नुक्ता कहते हैं। बहनों एवं बुआ का पीहर में गोरनी का आयोजन किया जाता रहा है। नुक्ता एवं अन्य प्रथाओं पर अब सीमित लोगों को निमंत्रण दिया जाता है। 

वंशानुगत उत्तरदायित्व- मालवा क्षेत्र में पुत्रों के न होने पर उसकी संपत्ति प्रत्यक्ष रूप से भाइयों तथा उनके पुत्रों के हिस्से में चली जाती है, किंतु अब परिवार के मुखिया की मृत्यु होने पर संपत्ति उसके पुत्रों में चली जाती है और समान रूप से बांट दी जाती हैं। यदि किसी व्यक्ति को कोई पुत्र नहीं है तो उसकी संपत्ति की उत्तराधिकारी पुत्रियां होती हैं। यदि किसी व्यक्ति की कोई संतान न हो तो वह किसी निकट संबंधी से बच्चा गोद ले सकता है। 

विवाह तथा आचार- यद्यपि परंपरागत रूप से अनुमत बहुविवाह प्रथा हिंदुओं में अपेक्षाकृत असामान्य और बहुपति प्रथा पूर्णतः अविद्यमान थी। सामान्यतः यह नियम है कि यदि यह कुछ व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण दूसरा विवाह करना हो तो संबंधित व्यक्ति को दूसरी पत्नी रखने से पूर्व अपनी पहली पत्नी से सहमति प्राप्त करना चाहिए।

विवाह संबंधों पर परंपरागत प्रतिबंध- सभी महत्वपूर्ण समुदायों में रक्त से संबंधित व्यक्तियों के साथ विवाह निषिद्ध है। एक ही गोत्र में विवाह निषिद्ध है। खातियों में विवाह संबंध से पूर्व दो गौत्र लड़के के तथा लड़के के मामा के तथा दो गौत्र लड़की व लड़की के मामा के निकाले जाते हैं। दोनों पक्षों में दोनों गौत्र नहीं मिलना चाहिए, तभी संबंध विवाह संस्कार तथा रीति-रिवाज- सगाई के समय सादा संस्कार किया जाता है तथा लड़के के संबंधी लड़की के घर आते हैं तथा लड़की को मिठाइयां व कपड़े देते हैं। इस संस्कार को गोद भरना कहते हैं।

विवाह की आयु- सामान्यतः लड़कियों के लिए विवाह की आयु 18 वर्ष तथा लड़के के लिए 21 वर्ष होती है। अनौपचारिक रूप से ग्रामीण अंचलों में विवाह आपसी बातचीत से तय किए जाते हैं। लग्न अर्थात विवाह के लिए शुभ तिथि तथा समय जो किसी ब्राम्हण पंडित के परामर्श से निश्चित किया जाता है। विवाह की तारीख से लगभग 15 दिन पहले दूल्हा के माता-पिता को सूचना दे दी जाती है। विवाह संस्कार से संबंधित रीति-रिवाज में एक जाति से दूसरी जाति में भिन्नता होती है किंतु मोटे तौर पर हिंदुओं में प्रमुख संस्कार सामान्यतः प्रत्येक वर्ग व जाति में किए जाते हैं। खानागार पहले दिन का संस्कार है। इसी दिन महिलाएं गांव के बाहर से मिट्टी लाती है और गीत गाती हैं। देवी पूजा के लिए चावल तथा पूड़ी बनाने के लिए चूल्हा बनाती हैं। दूसरे दिन भगवान गणेश तथा देवी मां की पूजा की जाती है। नौवें दिन तक खाना-पीना चलता है तथा खुशियां मनाई जाती हैं। जब घर के आंगन में मंडप बनाया जाता है, तो सभी विवाह संस्कार इस मंडप में खंभे के पास किए जाते हैं। दसवें दिन गांव के लोगों को आमंत्रित किया जाता है और माता की ओर से संबंधित दूल्हा के लिए विवाह पोषाक देते हैं। धोती-पगड़ी जैसे वस्त्र दूल्हा को मंडप में दिए जाते हैं, जो मामेरा भेंट के रूप में जानी जाती है। इस समय दूल्हा व दुल्हन के घर में एक-से कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 11वें दिन बारात जाती है, जिसमें वर के सगे संबंधी आदि तथा अन्य जातियों के लोग भी शामिल होते हैं। यह बारात वधू के घर जाती है, जहां बारात का स्वागत-सत्कार किया जाता है। जनवासा दिया जाता है तथा लग्न उसी शाम को होते हैं। वर-वधू मंडप के नीचे एक चौक पर बैठाए जाते हैं। पंडितों द्वारा मंत्रों का उच्चार करते हुए उनके हाथों को आपस में जोड़ा जाता है। ढोल बजाया जाता है। दूल्हा का शाल वधू के दुपट्टे में बांधा जाता है। वर-वधू पवित्र बेदी में प्रज्वलित अग्नि की सात बार परिक्रमा करते हैं। इसे भंवर, फेरे तथा सत्पदी कहा जाता है। इसके बाद वधू के परिवार के लोग पैर पूजन की रस्म करते हैं, जिसमें वर-वधू दोनों के पैर पूजे जाते हैं। पैर पूजने वाले उन्हें पुष्प भेंट देते हैं। दहेज व भोजन दिए जाने की परंपरा भी है। 13वें दिन विदाई किए जाने की परंपरा है। दुल्हन के साथ बरात दूल्हे के घर चली जाती है। इस प्रकार विवाह संपन्न होता है।

गोने की शुभ तिथि- दीवाली के बाद 11वें दिन गोना किया जाता है। गोना लड़की के यौवनावस्था प्राप्त कर लेने के बाद किया जाता है। इसमें वर का पिता अपने संबंधियों के साथ वधू के घर जाता है और अपनी बहू को विदा करवाकर ले जाता है। जब नातरा द्वारा विवाह संपन्न किया जाता है तो उसके बाद कोई संस्कार नहीं होता। नातरा के पूर्व वधू के पिता को भुगतान की गई रकम को छोड़कर कोई व्यय शामिल नहीं होता।

दहेज प्रथा- इस प्रथा की बुराइयों का तथाकथित पिछड़े वर्गों में व्यावहारिक दृष्टि से अभाव है। वधू के माता-पिता द्वारा दिया जाने वाला दहेज पहले से निर्धारित नहीं किया जाता। इसके लिए सौदा भी नहीं किया जाता। किंतु हैसियत के अनुसार स्वेच्छा से बेटी के लिए दिया जाता है। कतिपय मामलों में यह विवाह के पूर्व अंतिम रूप से निर्धारित कर लिया जाता है। लड़की के माता-पिता यदि निर्धन हो तो सामान्यतः कम पैसे की मांग करते हैं, जो कि विवाह के बदले में लड़की का मूल्य नहीं होता, बल्कि खर्च को पूरा करने के लिए एक व्यवस्था है। यह प्रथा अब तेजी से समाप्त होती जा रही है। उच्च जातियों में भले ही विभिन्न रूप में अभी तक यह बुराई बनी हुई है। सामान्यतः नकद व वस्तु दोनों ही रूप में अपने पुत्र के लिए भारी दहेज की मांग की जाती है।

तलाक- तलाक वर्जित नहीं है किंतु सामान्यतः यह पुनस्थापित नहीं किया जाता है। इसकी सभी जातियों जैसे खाती, गेहलोत, अहीर, गुर्जर तथा अन्य अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों में अनुमति दी गई है। तथापि मनुस्मृति में हिंदू जातियों में तलाक का उल्लेख नहीं किया गया है। इस प्रकार जब तक वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 पारित नहीं  किया गया था, तब तक विशिष्ट हिंदू जातियों में तलाक को केवल प्रथाओं के बल पर मान्यता दी गई। इसका कारण यह है  कि तलाक की कार्रवाइयां सामान्यतः विधि न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत नहीं की जाती। जिला एवं सत्र न्यायाधीश भोपाल ने यह जानकारी दी कि 1965 से 1969 तक के चार वर्षों की अवधि के दौरान रिकॉर्ड के अनुसार केवल 12 जोड़ों को तलाक दिया गया।

नातरा- नातरा के रूप में जानी जाने वाली प्रथा खातियों तथा अनुसूचित जातियों में सामान्य है। तथापि नातरा के समय माता-पिता भारी रकम की मांग करते हैं, जो झगड़े की रकम के रूप में पूर्व पति के लिए भुगतान की जाती है। शाब्दिक अर्थ में यह घनिष्ट संबंध तोड़ने की रकम है। इस प्रकार इसकी विशेषता यह है कि पति द्वारा तलाक की सूचना नहीं दी जाती, किंतु अपने व्यवहार से पत्नी को नातरा का सहारा लेने के लिए बाध्य कर देता है। यदि नातरा द्वारा पुनर्विवाह करने वाली महिला के पहले पति से बच्चे हो तो ये बच्चे उसके पिता के घर में रहते हैं, किंतु कोई दूधमुंहा बच्चा हो तो वह अपने साथ ले जाती है और उसे एक या दो वर्ष के पश्चात वापस भेज देती है।

मद्यपान- शादी, ब्याह या अन्य कार्यक्रम के अतिरिक्त भी अब मद्यपान एक फैशन का रूप लेता जा रहा है।

जुआ- त्योहार के समय विशेष रूप से दिवाली में जुआ खेलने की परंपरा है। भोपाल में यह परंपरा उग्र सामाजिक समस्या के रूप में देखी जाती है।

ग्रामीण मकान- गांवों में मकान सघन क्षेत्रों में एक समूह में होते हैं। वे सामान्यतः स्थानीय रूप में समतल देशी खपरैल की छत वाले होते हैं। ये मकान बिना खिड़कियों वाले होते हैं, उजाले के लिए दीवार में खाली जगह रौशनदान के रूप में छोड़ देते हैं। कतिपय मकानों में पशुशाला संलग्न होती हैं, जो ऊंचाई में सामान्यतः उथली अथवा पांच-छह फीट होती है। लकड़ी के खंभों से छत को सहारा दिया जाता है। दीवारें सामान्यतः मिट्टी में भूसा या बलोंडी मिलाकर बनाई जाती है तथा पीली मिट्टी की छपाई की जाती है। रेफटर के लिए सागौन की लकड़ी या खजूर के पेड़ के तने का उपयोग किया जाता है। वर्षा से दीवारों को बचाने के लिए मोटी सन की चटाइयां दीवारों पर टांग दी जाती हैं अथवा पलाश (खाखरे) की डालियों से इसे पानी लगने से बचाया जाता है। कमरों की संख्या कम होती है। गांवों में निर्धन परिवारों में केवल एक कमरा, मध्यम परिवारों में दो या तीन तथा संपन्न परिवारों में चार से पांच कमरे होते हैं। उच्च वर्ग के लोगों का मकान भिन्न तथा सज्जित होता है। दीवार को बाहर से गेरू, लाल चाक या सफेद खड़िया मिट्टी से पुती हुई होती है। मकान सामान्यतः बड़े होते हैं जिनकी छत खपरैल या टीन की चादरों की होती हैं। दीवारें सामान्यतः ईंटों या पत्थरों की बनाई जाती है, जो प्लास्तर युक्त होती है। निःसंदेह ग्रामीण क्षेत्र के मकानों में रसोईघर सबसे अंधेरा कमरा होता है। कतिपय गांव में विचित्र प्रथा पाई जाती है। गांव में गोबर के कंडों के लिए एक भंडारगृह है जो स्थानीय रूप से बिढहा, छंदेरा कहलाता है। इसमें एक तरफ एक गोल छेद रखा जाता है जिसमें कंडे रखे जाते हैं। गोबर के कंडों को निकालने के पश्चात इसे गोबर से बंद कर दिया जाता है। मकान निर्माण करने के पूर्व मुहूर्त निश्चित किया जाता है तथा उस स्थान पर भूमि की पूजा की जाती है। प्रसाद के रूप में गुड़ बांटा जाता है।

हालांकि वर्तमान में मकानों के निर्माण की यह पुरानी परंपरा लुप्त होती जा रही है। जो नए मकान बनाए जा रहे हैं, उनमें पूरी तरह शहरी छाप दिखाई दे रही है। गांवों के लोग पुराने मकान समाप्त कर ईंट-सीमेंट के मकान बना रहे हैं। दीवार पर पुट्टी, कलर इत्यादि करवा कर टाइल्स लगा कर सुसज्जित किया जा रहा है, जिसमें पूर्ण रूप से शहरी छाप नजर आती है। 

पुरुष परिधान- लोगों की वेशभूषा ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र में व्यापक रूप से अलग-अलग होती हैं। सांस्कृतिक संपर्क के अनुसार यह एक स्थान से दूसरे स्थान में भी बदलती रहती है। पुरुषों का आम पहनावा कमर से ऊपर अंगरखा, पथ्वी या सलूका (आधी बांह का चार या पांच बटन वाला सूती वस्त्र) है। कमर के नीचे एक धोती तथा सिर पर पगड़ी या साफा होता है। शीत ऋतु में अंगरखा के अंदर एक जाकेट या बंडी भी पहनी जाती है। सामान्यतः ब्राम्हण, खाती, ठाकुर तथा भील सफेद पगड़ी (साफा) पहनते हैं। शर्ट (कमीज) या बुशर्ट तथा पतलून (पैंट) उनका सामान्य पहनावा है। पुराने लोगों को आज भी इसी रूप में देख सकते हैं लेकिन युवाओं में अब यह चलन शहरी लोगों की तरह हो गया है।

महिला परिधान- महिलाएं सामान्यतः चमकीली रंगीन सूती कपड़े की चोली (कांचली), लहंगा (चटक रंग का पेटीकोट) तथा लुगड़ा (कंधों पर से होकर सिर ढंकने वाला चटक रंग का कपड़ा) पहनती हैं। उच्च जातियों में पोलका तथा ग्रामीण महिलाएं कांचली ब्लाउज के रूप में पहनती हैं। साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट आदि औसत महिलाओं की सामान्य वेशभूषा है। यद्यपि वयस्क महिलाएं चूड़ीदार पायजामा या बेलबाटम तथा कुर्ता ओढ़नी के साथ या बिना ओढ़नी के पहनती हैं।

पुरुष आभूषण- वयस्क व्यक्ति आभूषण नहीं पहनते किंतु विवाह के अवसर पर रूढ़िवादी दूल्हा स्वयं को अपने हाथों से आभूषणों से सजाता है। दोनों बांहों में बाजुबंद, गर्दन के चारों ओर खुगाली तथा पेट के चारों ओर सामने झूलते हुए पान टोला पहने जाते हैं। ये सभी आभूषण चांदी के होते हैं। बाजूबंद सबसे बजनदार होता है। कलात्मक रूप से बनाया गया बाजूबंद बांहों के ऊपरी भाग में पहना जाता है। आधुनिक समय में पुरुष गले में सोने की चेन तथा अंगुलियों में अंगूठी पहनते हैं।

महिला आभूषण- चेन व अंगूठी महिलाएं भी सामान्यतः पहनती है। इसके अलावा वह दोनों हाथों में गजरी, बालकी, सिर पर बोर, माथे पर चोगा तथा कानों में होते हुए सिर के दोनों ओर मोरझली पहनती है। सामान्यतः महिलाएं सिर पर बोर तथा मोरझली व गर्दन में हंसली, कान के ऊपरी भाग में बाली, धुंघरू तथा पैरों में कड़ी पहचती हैं। विवाहित महिलाएं सुहाग चिन्ह के रूप में बिछिया पहनती हैं, जबकि विधवा तथा अविवाहित लड़कियां इसे नहीं पहनती हैं। समाज के सभ्य वर्ग में आभूषणों को प्रतिदिन पहनने पर प्रतिबंध है, जिनमें कलाई पर सोने की चूड़ियां, सोने की अंगूठियां, कानों में कर्णफूल (टाप्स) या बुंदे तथा गले में सोने की चेन शामिल हैं।

भोजन- पूर्व गजेटियर में खानपान के संबंध में लार्ड का पर्यवेक्षण सामान्यतः काफी अच्छा है। भोजन सामान्यतः दो बार लिया जाता है दोपहर तथा शाम को। संपन्न लोग सुबह तथा अपरान्ह में कुछ हल्का नाश्ता लेते हैं। सुबह के समय चाय पीना अनेक गांवों में भी तेजी से लोकप्रिय हुआ। धनी तथा मध्यम वर्ग में भी तेजी से चाय लोकप्रिय हुई। धनी तथा मध्यम वर्ग के सामान्य भोजन में गेहूं के आटे की बनी घी लगी चपातियां (पतली रोटी), हाइड्रोजनेटेड तेल, दाल, चावल, सब्जियां तथा समय-समय पर मिठाइयां शामिल हैं। कतिपय लोगों द्वारा शकर के साथ दूध लिया जाता है। मौसमी फलों को छोड़कर अधिकांश मध्यम वर्ग के लोगों के लिए उन्हें जुटा पाना कठिन होता है। अत्यधिक निर्धन वर्ग के लोगों द्वारा गेहूं तथा ज्वार को मिलाकर बनाई गई रोटियां (जो पतली नहीं होती) या ज्वार तथा अन्य मोटे अनाज की रोटियां दाल-साग-सब्जीप्याज अथवा लहसुन खाई जाती रही हैं। वे इसे प्रायः दिन में तीन बार दाल तथा कभी-कभार उबले हुए आलू या प्याज के साथ लगातार एक ही रूप में लेते रहे हैं। घर में दुधारू पशु होने पर निर्भर करता है। दूध को ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं खरीदा जाता है। अकाल के समय बाजरा आदि से ही काम चलाना पड़ता था। अंडा तथा मांस का सेवन आज के समय में किया जा रहा है।

खाती समाज (Khati Samaj) संबंधी अन्य जानकारी संग्रह की जा रही है। 

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